M.N Roy autobiography | एम एन रॉय जीवन परिचय
M.N Roy autobiography | एम एन रॉय जीवन परिचय
मानवेन्द्रनाथ राय, आधुनिक भारत के प्रमुख विचारक थे। वे प्रथम भारतीय थे जो 'कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल' से अन्यन्त निकट से जुड़े थे तथा जिन्होंने लेनिन के साथ मिलकर 'विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन' के लिए कार्य किया। उनका व्यक्तित्व और उनके कार्य अन्तर्राष्ट्रीय थे।
भारतीय राजनीति में राज्य का स्थान दो कारणों से प्रमुख है। प्रथम उन्होंने नए दर्शन को विकसित किया जिसे रेडिकल ह्यूमनइज्म (मौलिक मानवतावाद ) कहा जाता है। राज्य ने भौतिकवाद की भी नई व्याख्या की तथा इसे नैतिक पुट प्रदान किया। दूसरे, आधुनिक भारत में राय पहले विचारक थे, जिन्होंने दलविहीन लोकतंत्र का सिद्धान्त उपस्थित किया। उनका चिन्तन और अनुभव दोनों व्यापक थे।जीवन परिचय : mn roy biography
मानवेन्द्रनाथ राय (1886-1954) एम.एन. राय के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म 6 फरवरी, 1886 को बंगाल में हुआ। उनका बचपन का नाम नरेन्द्र भट्टाचार्य था। वे विद्यार्थी जीवनकाल में ही क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़ गए। राज्य पर कई व्यक्तियों और संस्थाओं का प्रभाव पड़ा। बंगाल के स्वदेशी आन्दोलन का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे विवेकानन्द, दयानन्द और रामतीर्थ से प्रभावित थे। उन्होंने राजनीतिक दृष्टि, विपिनचन्द पाल और अरविन्द घोष के क्रान्तिकारी विचारों से प्राप्त की। सावरकर के त्याग का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। राज्य ने बंगाल में क्रान्तिकारी कार्यों के लिए प्रसिद्ध 'युगान्तर गुट' के नेताओं के साथ मिलकर कार्य किया।
राय 1910 में हावड़ा षड्यंत्र केस के सिलसिले में और बाद में 1915 में कलकत्ता की राजनीतिक डकैती के मामले में गिरफ्तार किए गए। 1915 के अन्त में वे भारत छोड़कर डच इण्डीज (इण्डोनेशिया) भाग कर चले गए। राय एक जगह स्थिर नहीं रहे। वे वहाँ से जावा, सुमात्रा, फिलीपीन्स, कोरिया और मंचूरिया गए। इसके बाद राय अमेरिका गए। वहाँ कुछ समय तक लाला लाजपतराय के साथ काम किया। अमेरिका बाद वे पेरिस को गए, जहाँ उन्होंने समाजवादी पाटियों को संगठित करने का काम किया तथा वहाँ समाजवादी दल की नेशनल कांफ्रेंस के प्रथम चेयरमैन बने। यहीं वे कम्युनिस्टों की ओर आकर्षित हुए। 1920 में लेनिन के निमंत्रण पर वे रूस गए तथा लगभग एक शताब्दी तक कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे।
एम.एन राय के राजनीतिक विचारों का विकास
राय के राजनीतिक विचारों में प्रारंभ से अन्त तक एकरूपता नहीं है। उनके विचार स्थिर नहीं रहे, अपितु परिवर्तित होते रहे। उनके विचारों के विकास को तीन कालों में विभाजित किया
जा सकता है।
प्रथम काल : 1901 से 1917 तक का है- इस समय में राय बंगाल के आतंकवादी आन्दोलन से सम्बन्धित रहे। वे इस समय एक रोमान्टिक 'क्रान्तिवादी थे।
द्वितीय काल : 1917 से प्रारम्भ होकर 1946 तक का है- इस समय राय रूढ़िवादी मॉक्सवादी
रहे. तथापि वे 1930-1946 के बीच अपनी स्थिति को बदलते रहे। : 1946 से मृत्युपर्यन्त तक का है इस अवधि में उन्होंने नव मानववाद या
तृतीय काल
मौलिक मानववाद (रेडिकल ह्यूमनइज्म) के विचार को विकसित किया। उपरोक्त काल विभाजन के आधार पर राय के विचारों का अध्ययन किया जाना सुविधाजनक है।
एम.एन राय और रोमान्टिक क्रान्तिवाद
राम प्रारम्भिक काल में रोमान्टिक क्रान्तिवादी रहे। वर्तमान के प्रारम्भिक काल में देश में ब्रिटिश सत्ता के विरोध में तीव्र असन्तोष इसको दूर करने के
लिए उदारवादियों ने जो मार्ग अपनाया, वह शान्तिपूर्ण, अहिंसक, पूर्णतः वैधानिक मार्ग था। भारत के युवकों को यह मार्ग अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाया। फलतः बंगाल और महाराष्ट्र में आतंकवाद और क्रान्तिकारी आन्दोलन पनपने लगा। उस समय के क्रान्तिकारी आन्दोलन ने समकालीन यूरोप के हिंसक, अराजकवादी आन्दोलनों से तथा कई भारतीय विचारकों से और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण की राय का यह मत था कि क्रान्तिकारी और आतंवादी उपायों के द्वारा ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिए बाध्य किया जा सकता है कि वह भारतीयों को सत्ता सौंप दे। क्रान्तिकारी कार्यवाहियों के लिए शस्त्रों की आवश्यकता थी। अतः क्रान्तिकारियों का विचार था कि राजनीतिक डकैतियों के द्वारा धन प्राप्त कर आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। क्रान्तिकारी आन्दोलन किसी आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम को लेकर नहीं चला था। अतः वह सीमित रहा। उसे जनसमर्थन प्राप्त नहीं हो पाया। क्रान्तिकारी आन्दोलन सिद्धान्त में केवल रोमांटिक वाद था। व्यवहार में इसका कोई आधार नहीं था। इस अवधि में राय के विचार काफी सीमित थे। उन पर सांस्कृतिक अध्यात्मवाद हावी था। राय के विचारों में गम्भीरता का अभाव था। अमेरिका जाने के बाद राय ने समकालीन इतिहास, राजनीतिक स्थिति और आर्थिक पहलू का अध्ययन किया। तब उनके विचार का क्षेत्र व्यापक बना और वे समाजवाद की और आकर्षित हुए।
एम.एन राय और मार्क्सवाद
राय को मैक्सिको प्रवास के समय माइकेल बोरोडिन ने मार्क्सवाद की ओर प्रेरित किया। उन्होंने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया और रूढ़िवादी मार्क्सवाद को स्वीकार किया। 1917 से 1946 तक राय का मार्क्सवाद से सम्बन्ध रहा पर एक मार्क्सवादी के रूप में राय मार्क्स के विचारों के प्रति अन्धभक्ति प्रदर्शित नहीं कर सके। प्रारम्भिक अवस्था में वे रूढ़िवादी साम्यवाद के समर्थक थे। यह काल 1917-1930 का था। 1930-1939 के मध्य वे रेडिकल कांग्रेसी रहे। उन्होंने साम्यवाद में कुछ संशोधन उपस्थित किए। 1940-1946 के मध्य वे मौलिक लोकतन्त्रवादी हो गए।
M.N Roy और राष्ट्रवाद
राग का विश्वास राष्ट्रवाद में नहीं था। वे राष्ट्रवाद को प्रतिक्रियावादी प्रवृत्ति मानते थे। साम्यवादी के रूप में भी राग ने राष्ट्रवाद को अस्वीकार किया और बाद में एक गारकताकारू के रूप में भी उन्होंने राष्ट्रवाद की आलोचना की। अपने मौलिक मानववाद के सिद्धान में राष एक ऐसे व्यक्ति का विचार प्रस्तुत करते हैं जो राष्ट्रीयता की संकुचित और संकीर्ण परिधि में सिमटा हुआ नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय राय ने कांग्रेस के निर्णयों और कांग्रेस की भूमिका की आलोचना भी इसी आधार पर की। उनका विचार था कि गुट रा (जर्मन, इटली, जापान आदि) फासीवाद अथवा तानाशाही के लिए लड़ रहे हैं। जबकि मित्र राहु (ब्रिटेन, फ्रांस अमेरिका आदि) लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। अतः कांग्रेस को मित्र राष्ट्रों की सहायता करनी चाहिए न कि इस अवसर पर किसी प्रकार के आन्दोलन करके ब्रिटैन के सम्मुख कठिनाइयाँ पैदा करनी चाहिये जब गांधी जी ने 'भारत छोड़ो' आन्दोलन चलाया तो राज्य ने उनको आलोचना की और कांग्रेस को फॉसिस्ट संगठन कहा। राय के आर्थिक विचार :
राय, नियोजित विकास के समर्थ थे, पर नियोजन की समाजवादी और पूँजीवादी दोनों ही पद्धतियों की राय ने आलोचना की। समाजवादी नियोजन की आलोचना इस आधार पर की कि समाजवाद में नियोजन एक सशक्त माध्यम से किया जाता है तथा सामाजिक प्रगति के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त किया जाता है। पूँजीवादी नियोजन की आलोचना इस आधार पर की कि पूँजीवाद में नियोजन का लक्ष्य अधिकाधिक लाभ कमाना होता है साथ ही गरीबों का शोषण भी होता है। राय इन दोनों प्रकार की नियोजन प्रणालियों की आलोचना करने के बाद समुचित आर्थिक नियोजन का समर्थन करते हैं। वे औद्योगीकरण द्वारा भौतिक समृद्धि को बढ़ाने, आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने और जनता की क्रय शक्ति को बढ़ाने के समर्थक थे। वे नये उद्योगों को विकसित करने के समर्थक थे। इससे रोजगार के नये अवसर मिलेंगे और कृषि योग्य भूमि पर दबाव कम होगा। राय उत्पादन के साधनों का नियंत्रण जनता में निहित करने के समर्थक थे। राय ने व्यक्तिगत सम्पत्ति का समर्थन किया पर उससे सामाजिक शोषण का विरोध किया। सम्पत्ति के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया, पर उसके सहकारी स्वामित्व पर बस दिया। राय आर्थिक विकेन्द्रीकरण के समर्थक थे। उन्होंने कृषि विकास पर जोर दिया। कृषि विकास के लिये यंत्रीकरण का समर्थन नहीं किया। उन्हें भय था कि कृषि का यंत्रीकरण करने से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ेगी। ये विशालकाय उर्वरक कारखानों को लगाने के समर्थक नहीं थे। गोबर खाद की श्रेष्ठता को मानते थे। बड़ी सिंचाई योजनाओं के स्थान पर छोटी सिंचाई योजनाओं को उन्होंने प्राथमिकता दी। राय जोत की सीमा निर्धारित करने के समर्थक थे। उन्होंने सहकारी ऋण-व्यवस्था सहकारी क्रय-विक्रय समितियों की स्थापना, सहकारी खेती, सहकारी फार्म का समर्थन किया।
